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एंज़ाइम चुनकर देखें
सूची से कोई एंज़ाइम चुनें, या उसके चिह्न पर क्लिक करें, उसका काम अलग से देखने के लिए
मापन
- कॉपी हुए क्षारक
- 0
- बने ओकाज़ाकी खंड
- 0
- चारगैफ नियम (A=T, G≡C)
- A=T 25% · G≡C 25%
- हाइड्रोजन बंध
- 30
- हाइब्रिड / हल्का भिन्न
- 25% / 75%
- अनुक्रम की लंबाई
- 12
सिमुलेशन का उपयोग कैसे करें
- सबसे पहले "प्रतिकृति फोर्क" दृश्य देखें: मूल डीएनए दाईं ओर अभी जुड़ा हुआ है, फोर्क के पास हेलिकेज़ उसे खोल रहा है, और बाईं ओर दो नए रज्जुक बन रहे हैं।
- "एंज़ाइम चुनकर देखें" सूची से एक-एक करके चुनें: हेलिकेज़ कहाँ काम कर रहा है, प्राइमेज़ कब प्राइमर लगा रहा है, पॉलीमरेज़ कैसे रज्जुक बढ़ा रहा है, लाइगेज़ कब जोड़ रहा है।
- "टेम्पलेट अनुक्रम" में तीन नमूने बदलकर देखें कि क्षारक-युग्मन के रंग कैसे बदलते हैं; फिर "स्वयं लिखें" चुनकर अपने A, T, G, C अक्षर टाइप करें और तुरंत उसका पूरक रज्जुक बनते देखें।
- "क्षारक युग्मन पर ज़ूम" दृश्य में जाकर हर युग्म के बीच खींची रेखाएँ गिनें — A-T के लिए दो, G-C के लिए तीन।
- "मेसेल्सन-स्टाल प्रयोग" दृश्य में "पीढ़ी" स्लाइडर को 0 से धीरे-धीरे बढ़ाएँ और देखें नली में भारी, हाइब्रिड और हल्के बैंड कैसे बदलते हैं; सही प्रतिशत दाईं ओर लिखा मिलेगा।
- मापन पैनल में देखें कि कॉपी हुए क्षारक और बने ओकाज़ाकी खंड की संख्या चलते-चलते बढ़ती रहती है; ज़रूरत हो तो "फिर से शुरू" दबाकर दोनों को शून्य से शुरू करें।
कटी उंगली फिर जुड़ जाती है: डीएनए हर दिन कॉपी होता है
हाथ में लगी छोटी चोट कुछ दिनों में भर जाती है। बाल कटवाने के बाद फिर बढ़ते हैं। खून देने के बाद शरीर नई रक्त कोशिकाएँ बना लेता है। इन सभी के पीछे एक ही घटना है: पुरानी कोशिकाएँ खत्म होती हैं और नई कोशिकाएँ बनती हैं, और हर नई कोशिका को ठीक पुरानी कोशिका जैसा डीएनए चाहिए। एक भी अक्षर गलत जगह लग जाए तो कोशिका ठीक से काम नहीं करती, और कभी-कभी यह कैंसर जैसी बीमारी का कारण भी बन सकता है।
तो कोशिका के भीतर लंबा डीएनए अणु ठीक अपनी ही तरह एक और प्रति कैसे बनाता है? इसी सवाल का जवाब है डीएनए प्रतिकृति। इस पृष्ठ पर हम देखेंगे डीएनए की संरचना, वह कैसे खुलकर कॉपी होता है, कौन-सा एंज़ाइम कौन-सा काम करता है, और वैज्ञानिकों ने कैसे साबित किया कि यह प्रक्रिया "अर्धसंरक्षी" है — भारी और हल्के नाइट्रोजन तथा एक अपकेंद्रित्र (centrifuge) की मदद से।
यही सिद्धांत, प्रयोगशाला की एक नली में दोहराया जाए तो फोरेंसिक वैज्ञानिकों को एक बाल या लार की बूँद से अपराधी पहचानने में मदद करता है — इस तकनीक को PCR कहते हैं, जो कुछ ही डीएनए अणुओं से अरबों प्रतियाँ बना देती है। पृष्ठ के अंत में इसका विस्तार से ज़िक्र है।
शुरुआत से समझें: डीएनए प्रतिकृति क्या है
डीएनए (डीऑक्सीराइबोन्यूक्लिक एसिड) एक मुड़ी हुई सीढ़ी जैसा अणु है — एक द्विकुंडली (double helix) — जो दो रज्जुकों (strands) से मिलकर बना होता है। हर रज्जुक न्यूक्लियोटाइड की एक लंबी शृंखला है, और हर न्यूक्लियोटाइड में तीन भाग होते हैं: एक डीऑक्सीराइबोज़ शर्करा, एक फॉस्फेट समूह, और चार में से एक नाइट्रोजनी क्षारक। शर्करा और फॉस्फेट मिलकर शर्करा-फॉस्फेट मूलक (backbone) बनाते हैं, जबकि क्षारक भीतर की ओर सीढ़ी के डंडों जैसे टिके रहते हैं।
चार क्षारक हैं: एडेनिन (A), थाइमिन (T), ग्वानिन (G) और साइटोसिन (C)। एक रज्जुक का A सदैव दूसरे रज्जुक के T से जुड़ता है, और G सदैव C से। यही वाटसन-क्रिक क्षारक-युग्मन नियम है, जो जेम्स वाटसन और फ्रांसिस क्रिक ने 1953 में प्रस्तावित द्विकुंडली संरचना से आया (रोज़लिंड फ्रैंकलिन के एक्स-रे चित्रों की सहायता से)। दो रज्जुक विपरीत दिशा में चलते हैं — एक 5′ से 3′ की ओर, तो दूसरा उसके ठीक बगल में 3′ से 5′ की ओर — इसे प्रतिसमांतर (antiparallel) व्यवस्था कहते हैं।
परिभाषा इस तरह लिखें: डीएनए प्रतिकृति वह जैवरासायनिक प्रक्रिया है जिसमें डीएनए अणु के दो रज्जुक अलग होते हैं, और हर पुराना रज्जुक एक टेम्पलेट की तरह काम करके अपने पूरक नए रज्जुक का संश्लेषण कराता है, जिससे दो समान द्विरज्जुकी डीएनए अणु बनते हैं। हर नए अणु में एक पुराना और एक नया रज्जुक होता है — यही आधा-आधा बँटवारा "अर्धसंरक्षी" शब्द का मतलब है।
यह प्रक्रिया कोशिका चक्र की S अवस्था में होती है, कोशिका विभाजन से ठीक पहले। जिस स्थान से दो रज्जुक पहले अलग होते हैं उसे प्रतिकृति का उद्गम स्थल (origin of replication) कहते हैं; जीवाणु के एक वृत्ताकार गुणसूत्र में एक ही उद्गम स्थल होता है, जहाँ से दो प्रतिकृति फोर्क विपरीत दिशाओं में आगे बढ़ते हैं।
इस अध्याय के महत्वपूर्ण शब्द
ये शब्द इस अध्याय के लगभग हर प्रश्न में आते हैं — एक बार अच्छी तरह समझ लें, आगे पढ़ना आसान हो जाएगा।
| शब्द | सरल अर्थ |
|---|---|
| न्यूक्लियोटाइड | डीएनए की इकाई: शर्करा + फॉस्फेट + एक क्षारक (A/T/G/C) |
| शर्करा-फॉस्फेट मूलक | रज्जुक की संरचना थामने वाली शृंखला; क्षारक इससे जुड़े रहते हैं |
| प्रतिसमांतर (antiparallel) | दो रज्जुक विपरीत दिशा में चलते हैं: एक 5′→3′, दूसरा 3′→5′ |
| प्रतिकृति फोर्क | वह बिंदु जहाँ द्विकुंडली खुलकर दो एकल रज्जुकों में बँट जाती है |
| हेलिकेज़ | जो एंज़ाइम दो रज्जुकों के बीच के हाइड्रोजन बंध तोड़कर डीएनए खोलता है |
| SSB प्रोटीन | एकल-रज्जुक बंधनकारी प्रोटीन; खुले हुए रज्जुक को फिर से जुड़ने नहीं देता |
| प्राइमेज़ | जो एंज़ाइम पहले एक छोटा RNA प्राइमर लगाता है, जहाँ से पॉलीमरेज़ अपना काम शुरू करता है |
| डीएनए पॉलीमरेज़ | जो एंज़ाइम प्राइमर के बाद 5′→3′ दिशा में नया पूरक न्यूक्लियोटाइड जोड़कर रज्जुक बढ़ाता है |
| अग्रगामी रज्जुक | वह नया रज्जुक जो फोर्क की दिशा में निरंतर, बिना रुके बनता है |
| पश्चगामी रज्जुक | वह नया रज्जुक जो फोर्क की विपरीत दिशा में छोटे-छोटे खंडों में बनता है |
| ओकाज़ाकी खंड | पश्चगामी रज्जुक पर बनने वाला हर छोटा डीएनए खंड; 1968 में रेइजी और सुनेको ओकाज़ाकी ने खोजा |
| लाइगेज़ | जो एंज़ाइम दो सटे डीएनए खंडों के बीच का अंतराल जोड़कर एक निरंतर रज्जुक बनाता है |
| अर्धसंरक्षी प्रतिकृतियन | हर नए डीएनए में एक पुराना और एक नया रज्जुक होने का सिद्धांत |
| प्रूफरीडिंग | पॉलीमरेज़ की अपनी वह क्षमता जिससे वह गलत लगा क्षारक पकड़कर हटा देता है |
क्षारक युग्मन, हाइड्रोजन बंध और चारगैफ का नियम
1950 के दशक में जीवरसायनज्ञ इरविन चारगैफ ने कई प्रजातियों के डीएनए की जाँच करके पाया कि किसी भी डीएनए अणु में एडेनिन की मात्रा सदैव थाइमिन के बराबर होती है, और ग्वानिन की मात्रा सदैव साइटोसिन के बराबर — भले ही A+T और G+C का अनुपात हर प्रजाति में अलग हो सकता है। इसी को चारगैफ का नियम कहते हैं, और यही नियम बाद में वाटसन-क्रिक के क्षारक-युग्मन मॉडल का आधार बना।
इसका कारण हाइड्रोजन बंधों की संख्या में छिपा है। A और T के बीच दो हाइड्रोजन बंध बनते हैं, जबकि G और C के बीच तीन। अधिक बंध होने से G-C युग्म A-T युग्म से थोड़ा अधिक स्थिर और ऊष्मा-प्रतिरोधी होता है। सिमुलेशन के "क्षारक युग्मन पर ज़ूम" दृश्य में ठीक यही डैश रेखाएँ हाइड्रोजन बंध दिखाती हैं।
नीचे दी गई तालिका में सिमुलेशन के तीन नमूना अनुक्रम दिखाए गए हैं। पहला पूरी तरह संतुलित है (हर क्षारक 25%), दूसरा GC-प्रधान और तीसरा AT-प्रधान है। ध्यान दें, तीनों में %A = %T और %G = %C — यही चारगैफ का नियम है, अनुक्रम कैसा भी हो। GC-प्रधान अनुक्रम में हाइड्रोजन बंध भी अधिक हैं, इसलिए वह डीएनए भाग ऊष्मा में अधिक स्थिर रहता है।
A = T, G = Cचारगैफ का नियम, एक ही डीएनए अणु में
(A + G) = (T + C)प्यूरीन की संख्या सदैव पिरिमिडीन की संख्या के बराबर
| नमूना अनुक्रम (5′→3′) | %A | %T | %G | %C | हाइड्रोजन बंध |
|---|---|---|---|---|---|
| ATGCGTACGCAT | 25% | 25% | 25% | 25% | 30 |
| GGGGCCCCATAT | 17% | 17% | 33% | 33% | 32 |
| ATATATGCATAT | 42% | 42% | 8% | 8% | 26 |
अर्धसंरक्षी सिद्धांत और मेसेल्सन-स्टाल प्रयोग
द्विकुंडली संरचना पता चलने के बाद यह सवाल उठा कि प्रतिकृतियन में दो नए डीएनए वास्तव में कैसे बनते हैं। तीन संभावनाएँ प्रस्तावित हुईं। अर्धसंरक्षी (semi-conservative): हर नए अणु में एक पुराना रज्जुक, एक नया रज्जुक। संरक्षी (conservative): दोनों पुराने रज्जुक साथ रहेंगे, और पूरी तरह नया अणु अलग से बनेगा। परिक्षिप्त (dispersive): पुराने-नए हिस्से दोनों नए अणुओं में मिश्रित होकर बँट जाएँगे।
1958 में मैथ्यू मेसेल्सन और फ्रैंकलिन स्टाल ने एक सुंदर प्रयोग से इन तीनों में सही सिद्धांत चुना। उन्होंने E. coli जीवाणु को पहले भारी नाइट्रोजन समस्थानिक ¹⁵N वाले माध्यम में कई पीढ़ियों तक बढ़ाया, जिससे उनके डीएनए के दोनों रज्जुक भारी हो गए। फिर उन्हें सामान्य, हल्के ¹⁴N वाले माध्यम में स्थानांतरित किया और हर पीढ़ी के बाद डीएनए निकालकर सीज़ियम क्लोराइड (CsCl) घनत्व-प्रवणता अतिकेंद्रापसारण (ultracentrifugation) से जाँचा। इस विधि में भारी डीएनए नली के नीचे की ओर, हल्का डीएनए ऊपर की ओर, और मध्यम घनत्व वाला हाइब्रिड डीएनए (एक भारी + एक हल्का रज्जुक) ठीक बीच में बैंड बनाता है।
ठीक एक पीढ़ी बाद सारा डीएनए एक ही मध्यम (हाइब्रिड) बैंड में जमा हुआ — कोई शुद्ध भारी बैंड नहीं बचा। यह परिणाम संरक्षी मॉडल को तुरंत खारिज कर देता है, क्योंकि संरक्षी मॉडल में पहली पीढ़ी में ही एक शुद्ध भारी बैंड और एक शुद्ध हल्का बैंड, दोनों साथ दिखते। दूसरी पीढ़ी में आधा डीएनए हाइब्रिड रहा और आधा पूरी तरह हल्का हो गया — दो साफ बैंड, कोई धीरे खिसकता एक बैंड नहीं (जो परिक्षिप्त मॉडल में दिखता)। परिणाम पूरी तरह अर्धसंरक्षी मॉडल से मेल खाते हैं, और सिर्फ उससे।
हर पीढ़ी में हाइब्रिड अंश का हिसाब एक सरल नियम से होता है: n पीढ़ी बाद हाइब्रिड द्विरज्जुकों का अंश = (½)^(n−1), बाकी पूरी तरह हल्का होता है। उदाहरण के लिए, पीढ़ी 3 पर हाइब्रिड 25.00% और हल्का 75.00%; पीढ़ी 5 पर हाइब्रिड घटकर मात्र 6.25% रह जाता है, हल्का बढ़कर 93.75% हो जाता है। n ≥ 1 की किसी भी पीढ़ी में पूरी तरह भारी द्विरज्जुक नहीं बचता, क्योंकि हर पुराना भारी द्विरज्जुक अपनी पहली ही प्रतिकृति में दो अलग संतति अणुओं में बँट जाता है। नीचे की तालिका में पीढ़ी 0 से 6 तक का पूरा हिसाब है।
हाइब्रिड अंश = (1/2)^(n − 1), n ≥ 1अर्धसंरक्षी प्रतिकृतियन में, पीढ़ी n पर
| पीढ़ी (n) | भारी बैंड (¹⁵N-¹⁵N) | हाइब्रिड बैंड (¹⁵N-¹⁴N) | हल्का बैंड (¹⁴N-¹⁴N) |
|---|---|---|---|
| 0 | 100.00% | 0.00% | 0.00% |
| 1 | 0.00% | 100.00% | 0.00% |
| 2 | 0.00% | 50.00% | 50.00% |
| 3 | 0.00% | 25.00% | 75.00% |
| 4 | 0.00% | 12.50% | 87.50% |
| 5 | 0.00% | 6.25% | 93.75% |
| 6 | 0.00% | 3.13% | 96.88% |
प्रतिकृति के एंज़ाइम और उनका काम
प्रतिकृतियन कोई एक एंज़ाइम अकेले नहीं करता; यह एक टीम का काम है, और हर सदस्य की एक निश्चित ज़िम्मेदारी है। सिमुलेशन की "एंज़ाइम चुनकर देखें" सूची से एक-एक चुनकर हर एंज़ाइम का काम अलग से देखा जा सकता है। नीचे तालिका में संक्षेप में सबका काम दिया गया है।
इन पाँच के अलावा दो सहायक एंज़ाइमों के नाम भी परीक्षा में आ सकते हैं। टोपोआइसोमरेज़ (जाइरेज़) फोर्क के आगे बनने वाली अतिरिक्त कुंडलन (supercoiling) को कम करता है, नहीं तो हेलिकेज़ आगे नहीं खोल पाता। और प्रोकैरियोट में डीएनए पॉलीमरेज़-I हर RNA प्राइमर हटाकर उस जगह डीएनए बिठाता है, फिर लाइगेज़ अंतिम जोड़ लगाता है।
| एंज़ाइम | काम |
|---|---|
| हेलिकेज़ | दो रज्जुकों के बीच हाइड्रोजन बंध तोड़कर डीएनए खोलता है, प्रतिकृति फोर्क बनाता है |
| SSB प्रोटीन | अलग हुए एकल रज्जुकों को थामे रखता है, ताकि वे फिर न जुड़ें |
| टोपोआइसोमरेज़ | फोर्क के आगे बनने वाली अतिरिक्त कुंडलन को काटकर हटाता है |
| प्राइमेज़ | एक छोटा RNA प्राइमर लगाता है; डीएनए पॉलीमरेज़ केवल पहले से मौजूद रज्जुक के सिरे पर जोड़ सकता है, शून्य से शुरू नहीं कर सकता |
| डीएनए पॉलीमरेज़ | प्राइमर के बाद सही पूरक न्यूक्लियोटाइड जोड़ता है, सदैव 5′→3′ दिशा में, और अपनी गलतियाँ स्वयं सुधारता है |
| लाइगेज़ | ओकाज़ाकी खंडों के बीच के फॉस्फोडाइएस्टर अंतराल जोड़कर पश्चगामी रज्जुक को एक निरंतर रज्जुक बनाता है |
अग्रगामी रज्जुक, पश्चगामी रज्जुक और ओकाज़ाकी खंड
डीएनए पॉलीमरेज़ का एक सख्त नियम है: यह नया रज्जुक केवल 5′→3′ दिशा में बढ़ा सकता है, कभी उल्टी दिशा में नहीं। लेकिन दो पुराने टेम्पलेट रज्जुक विपरीत दिशा (प्रतिसमांतर) में चलते हैं, इसलिए एक ही फोर्क पर दो नए रज्जुकों को दो अलग तरीकों से बनना पड़ता है।
अग्रगामी रज्जुक: निरंतर, बिना रुके
जिस टेम्पलेट रज्जुक का 3′ सिरा फोर्क की ओर है, उस पर नया रज्जुक ठीक फोर्क की गति की दिशा में ही 5′→3′ बढ़ सकता है। इसलिए केवल एक प्राइमर लगता है, शुरुआत में एक बार, फिर पॉलीमरेज़ फोर्क के साथ-साथ निरंतर आगे बढ़ता रहता है। इसी रज्जुक को अग्रगामी रज्जुक (leading strand) कहते हैं।
- प्राइमर ज़रूरत: सिर्फ एक बार, शुरुआत में
- संश्लेषण: निरंतर, फोर्क की दिशा में ही
- एंज़ाइम: E. coli में डीएनए पॉलीमरेज़ III, एक बार शुरू होकर लगातार काम करता है
पश्चगामी रज्जुक: खंड-दर-खंड, ओकाज़ाकी खंड
दूसरे टेम्पलेट रज्जुक का 5′ सिरा फोर्क की ओर है, इसलिए उस पर नया रज्जुक बनाने के लिए पॉलीमरेज़ को फोर्क की विपरीत दिशा में बढ़ना पड़ता है। फोर्क जैसे-जैसे आगे बढ़ता है, नया टेम्पलेट खुलता जाता है, और हर बार प्राइमेज़ एक नया छोटा RNA प्राइमर लगाता है, जिससे पॉलीमरेज़ एक छोटा खंड पिछले खंड तक बनाता है।
इन छोटे खंडों को ओकाज़ाकी खंड कहते हैं, जिन्हें 1968 में जापानी वैज्ञानिक रेइजी ओकाज़ाकी और उनकी पत्नी सुनेको ओकाज़ाकी ने पहली बार पहचाना। हर खंड पूरा होने पर लाइगेज़ उसे पिछले खंड से जोड़ देता है, इससे पहले हर प्राइमर के RNA भाग को हटाकर उस जगह डीएनए बिठाया जाता है (प्रोकैरियोट में यह डीएनए पॉलीमरेज़-I का काम है)।
इस सिमुलेशन में स्पष्टता के लिए हर ओकाज़ाकी खंड ठीक 6 क्षारक लंबा और प्राइमर 2 क्षारक लंबा दिखाया गया है — असल यूकैरियोटिक कोशिका में एक खंड औसतन लगभग 200 न्यूक्लियोटाइड लंबा होता है (जीवाणु में और भी लंबा, 1,000-2,000 न्यूक्लियोटाइड), और वास्तविक समय भी इससे कहीं कम व्यवस्थित होता है।
- प्राइमर ज़रूरत: बार-बार, हर खंड की शुरुआत में
- संश्लेषण: खंड-दर-खंड, फोर्क की विपरीत दिशा में
- अंत में लाइगेज़ हर खंड को जोड़कर एक निरंतर रज्जुक बनाता है
प्रूफरीडिंग और उत्परिवर्तन (mutation)
डीएनए पॉलीमरेज़ लगभग सटीक है, पर पूरी तरह नहीं। गलत क्षारक लगने की मूल दर लगभग 1,00,000 में से 1 है। लेकिन पॉलीमरेज़ की अपनी 3′→5′ एक्सोन्यूक्लिएज़ क्रिया गलत क्षारक को पहचानकर हटा देती है और सही क्षारक लगा देती है। इस "प्रूफरीडिंग" के बाद गलती की दर घटकर लगभग 1,00,00,000 में 1 रह जाती है।
प्रतिकृतियन के बाद एक अलग मिसमैच रिपेयर तंत्र बाकी बची लगभग सभी गलतियाँ पकड़ लेता है। मिलाकर, अंतिम गलती की दर घटकर लगभग 1,00,00,00,000 क्षारकों में 1 रह जाती है। जो थोड़ी-सी गलती प्रूफरीडिंग और रिपेयर दोनों से बच जाती है, वही डीएनए अनुक्रम में स्थायी बदलाव यानी उत्परिवर्तन (mutation) बन सकती है।
उत्परिवर्तन हमेशा हानिकारक नहीं होता। अधिकतर उदासीन होते हैं, कुछ हानिकारक (जैसे किसी काम कर रहे जीन को निष्क्रिय कर देना), और कुछ लाभकारी भी हो सकते हैं, जो विकास (evolution) का कच्चा माल देते हैं। लेकिन जब प्रूफरीडिंग या रिपेयर तंत्र स्वयं बिगड़ जाए, तो उत्परिवर्तन दर बहुत बढ़ जाती है — यह कैंसर के कारणों में एक है।
डीएनए बनाम RNA: ज़रूरी अंतर
डीएनए और RNA दोनों न्यूक्लिक एसिड हैं, पर संरचना और काम में कई अंतर हैं, जो इस अध्याय में बार-बार आते हैं।
| विशेषता | डीएनए | RNA |
|---|---|---|
| शर्करा | डीऑक्सीराइबोज़ | राइबोज़ |
| क्षारक | A, T, G, C | A, U (थाइमिन के स्थान पर यूरेसिल), G, C |
| रज्जुक | सामान्यतः द्विरज्जुकी | सामान्यतः एकरज्जुकी |
| स्थिरता | अधिक स्थिर, लंबे समय तक संग्रहण योग्य | तुलना में कम स्थिर |
| मुख्य कार्य | आनुवंशिक जानकारी संग्रहित व स्थानांतरित करना | संदेश ले जाना (mRNA), प्रोटीन बनाना (rRNA, tRNA), या प्राइमर बनना |
| इस अध्याय में भूमिका | जिसकी प्रतिकृति बनती है | प्राइमेज़ द्वारा लगाया गया अस्थायी प्राइमर |
सिमुलेशन में स्वयं प्रयोग करें
हर प्रयोग से पहले चाहें तो "फिर से शुरू" दबाकर कॉपी हुए क्षारक और ओकाज़ाकी खंड की गिनती शून्य से शुरू करें।
प्रयोग 1: हर एंज़ाइम को बारी-बारी अलग करके देखें
"प्रतिकृति फोर्क" दृश्य में "एंज़ाइम चुनकर देखें" से हेलिकेज़, SSB, प्राइमेज़, पॉलीमरेज़ और लाइगेज़ एक-एक करके चुनें। हर बार चुने गए एंज़ाइम के चिह्न के चारों ओर एक चमकीला घेरा दिखेगा, जिससे यह देखना आसान होगा कि वह ठीक कहाँ काम कर रहा है।
प्रयोग 2: अग्रगामी और पश्चगामी रज्जुक की गति की तुलना करें
देखें, अग्रगामी रज्जुक (ऊपरी भुजा) हमेशा फोर्क के साथ बराबर गति से बढ़ता है। पश्चगामी रज्जुक (नीचे की भुजा) एक-एक ओकाज़ाकी खंड करके बढ़ता है, हर बार नए सिरे से शुरू होकर, फिर लाइगेज़ की चमक दिखने पर पिछले खंड से जुड़ जाता है।
प्रयोग 3: अपना अनुक्रम टाइप करें
"टेम्पलेट अनुक्रम" में "स्वयं लिखें" चुनें और बॉक्स में अपनी पसंद के A, T, G, C अक्षर टाइप करें। "क्षारक युग्मन पर ज़ूम" दृश्य में जाकर देखें आपके अनुक्रम का पूरक रज्जुक तुरंत नीचे बन जाता है, और मापन पैनल में चारगैफ का प्रतिशत तथा हाइड्रोजन बंध की संख्या भी बदल जाती है।
प्रयोग 4: मेसेल्सन-स्टाल में पीढ़ी बढ़ाकर देखें
"मेसेल्सन-स्टाल प्रयोग" दृश्य खोलें और "पीढ़ी" स्लाइडर को 0 से धीरे-धीरे बढ़ाएँ। पीढ़ी 1 पर नली में केवल एक हाइब्रिड बैंड दिखता है, उसके बाद हल्का बैंड बढ़ता रहता है और हाइब्रिड बैंड घटता रहता है, पर कभी पूरी तरह शून्य नहीं होता।
प्रयोग 5: GC-प्रधान और AT-प्रधान अनुक्रम के हाइड्रोजन बंध की तुलना करें
नमूना 2 (GC अधिक) और नमूना 3 (AT अधिक) को बारी-बारी चुनकर "हाइड्रोजन बंध" की रीडिंग देखें। समान लंबाई होने पर भी GC-प्रधान अनुक्रम में हाइड्रोजन बंध अधिक होंगे।
हल किए गए प्रश्न
नीचे हर संख्या सिमुलेशन के अपने मॉडल से सीधे गणना करके निकाली गई है, इसलिए यह कभी सिमुलेशन से अलग नहीं हो सकती।
प्रश्न 1: पूरक रज्जुक निकालें (प्रतिसमांतर याद रखते हुए)
सिमुलेशन का पहला नमूना टेम्पलेट (5′→3′) है: ATGCGTACGCAT। वाटसन-क्रिक नियम से हर क्षारक का पूरक लगाने पर पूरक रज्जुक मिलता है: TACGCATGCGTA। यह नया रज्जुक टेम्पलेट की विपरीत दिशा में चलता है, इसलिए भले ही यह ठीक इसी क्रम में जुड़ता है, इसका अपना 5′ सिरा टेम्पलेट के उस सिरे के सामने है जिसे 3′ कहा गया है — दोनों रज्जुक प्रतिसमांतर हैं, केवल उलटी हुई प्रतियाँ नहीं।
इन 12 क्षारक-युग्मों में A 3 बार आता है (इसलिए पूरक रज्जुक पर उन्हीं स्थानों पर T भी 3 बार आएगा), और G 3 बार आता है (C भी उतनी ही बार) — टेम्पलेट और पूरक रज्जुक की गिनती सदैव मेल खाती है, यही चारगैफ के नियम का आधार है।
प्रश्न 2: यदि %G = 20% है, तो बाकी क्षारकों का प्रतिशत निकालें
चारगैफ के नियम से %G = %C, इसलिए %C भी 20% है। बाकी बचा 100 − 20 − 20 = 60%, जो A और T में बराबर बँटेगा। इसलिए %A = %T = 30%। मिलाकर देखें: 30% + 30% + 20% + 20% = 100%।
%A = %T = (100 − 2 × %G) ÷ 2चारगैफ के नियम को उल्टा लगाकर
प्रश्न 3: इस टेम्पलेट में कुल हाइड्रोजन बंध गिनें
नमूना 1 में A 3 बार, T 3 बार, G 3 बार और C 3 बार है। हर A-T युग्म में 2 और हर G-C युग्म में 3 हाइड्रोजन बंध होते हैं। हर A किसी T से और हर G किसी C से जुड़ता है, इसलिए कुल बंध = (3 × 2) + (3 × 3) = 30।
कुल H-बंध = (A की संख्या × 2) + (G की संख्या × 3)
प्रश्न 4: 6,000 न्यूक्लियोटाइड के भाग में कितने ओकाज़ाकी खंड लगेंगे
एक यूकैरियोटिक ओकाज़ाकी खंड औसतन लगभग 200 न्यूक्लियोटाइड लंबा होता है। इसलिए 6,000 न्यूक्लियोटाइड के पश्चगामी टेम्पलेट को पूरा कॉपी करने में 6,000 ÷ 200 = 30 खंड लगेंगे, हर एक के लिए अपना RNA प्राइमर और अपना लाइगेज़ जोड़।
प्रश्न 5: पीढ़ी 3 और 5 पर भारी डीएनए का अंश निकालें
पीढ़ी 3 पर हाइब्रिड द्विरज्जुक का अंश (½)^(3−1) = 25.00%, बाकी 75.00% पूरी तरह हल्का, और पूरी तरह भारी 0%। पीढ़ी 5 पर हाइब्रिड घटकर 6.25% रह जाता है, हल्का बढ़कर 93.75% हो जाता है। अगर द्विरज्जुक के बजाय अलग-अलग रज्जुक के हिसाब से देखें, तो पीढ़ी 3 पर बचे मूल भारी रज्जुकों का अंश = (½)^3 = 12.50% होता है — यह अलग संख्या है, क्योंकि हर द्विरज्जुक में दो रज्जुक होते हैं।
प्रश्न 6: E. coli का पूरा गुणसूत्र सीधा फैलाने पर कितना लंबा होगा
E. coli के वृत्ताकार गुणसूत्र में लगभग 46,00,000 क्षारक-युग्म हैं। प्रति क्षारक-युग्म 0.34 nm लंबाई मानकर सीधा फैलाने पर लंबाई = 46,00,000 × 0.34 nm = 1,564 µm = 1.56 mm होती है। E. coli कोशिका स्वयं केवल लगभग 2 µm लंबी है, इसलिए यह डीएनए कोशिका की लंबाई से लगभग 782 गुना अधिक लंबा है — इसे कोशिका में भरने के लिए कसकर सुपरकॉइल करना पड़ता है। हेलिक्स का एक चक्कर पूरा करने में 10 क्षारक-युग्म लगते हैं, इसलिए पूरे गुणसूत्र में लगभग 4,60,000 चक्कर होते हैं।
लंबाई = क्षारक-युग्मों की संख्या × 0.34 nm/bp
प्रश्न 7: असली गति से पूरा गुणसूत्र कॉपी होने में कितना समय लगता है
असली E. coli प्रतिकृति फोर्क प्रति सेकंड लगभग 1,000 न्यूक्लियोटाइड जोड़ता है, और एक ही उद्गम स्थल से 2 फोर्क एक साथ विपरीत दिशाओं में काम करते हैं। इसलिए समय = 46,00,000 ÷ 2 ÷ 1,000 = 2,300 सेकंड, यानी लगभग 38.3 मिनट। इस सिमुलेशन में प्रति सेकंड 4 क्षारक दिखाए जाते हैं, जो केवल देखने की सुविधा के लिए है, असली गति नहीं।
वास्तविक जीवन में डीएनए प्रतिकृति का उपयोग
PCR (पॉलीमरेज़ चेन रिएक्शन) डीएनए प्रतिकृति के सिद्धांत को प्रयोगशाला की एक नली में दोहराकर बहुत कम मात्रा के डीएनए से अरबों प्रतियाँ बना देता है। 1983 में केरी मुलिस ने इसे बनाया और इसके लिए नोबेल पुरस्कार जीता। इसमें उच्च तापमान सहने वाला डीएनए पॉलीमरेज़ (Taq पॉलीमरेज़, गर्म झरनों के जीवाणु से पहली बार मिला), प्राइमर, और बार-बार गर्म-ठंडा चक्र लगते हैं, जिससे हर चक्र में डीएनए की मात्रा दोगुनी हो जाती है।
डीएनए फिंगरप्रिंटिंग (डीएनए प्रोफाइलिंग) में PCR से किसी नमूने — बाल, खून की बूँद, लार — से पर्याप्त डीएनए बनाकर कुछ छोटे, बार-बार दोहराए गए भागों (STR) की जाँच की जाती है। इन भागों की लंबाई का पैटर्न लगभग हर व्यक्ति में अलग होता है (समान जुड़वाँ को छोड़कर), इसलिए यह आज फोरेंसिक पहचान और पितृत्व परीक्षण में व्यापक रूप से प्रयोग होता है।
संपूर्ण जीनोम अनुक्रमण (genome sequencing), जीन थेरेपी, फसल और पशु नस्ल सुधार, रोग निदान किट, और कोविड-19 महामारी में इस्तेमाल हुई RT-PCR जाँच — ये सभी एक ही मूल क्षमता पर टिकी हैं: डीएनए (या पहले RNA को डीएनए में बदलकर) सटीक रूप से कॉपी करना।
ये गलतियाँ अक्सर होती हैं
परीक्षा में उत्तर लिखने से पहले इस सूची पर एक नज़र डाल लें।
- "प्रतिकृतियन संरक्षी विधि से होता है" लिखना गलत है। मेसेल्सन-स्टाल के प्रयोग (1958) ने साबित किया कि यह अर्धसंरक्षी है।
- यह मान लेना कि डीएनए पॉलीमरेज़ शून्य से नया रज्जुक शुरू कर सकता है — गलत। यह केवल पहले से मौजूद प्राइमर या रज्जुक के सिरे पर जोड़ सकता है, इसलिए प्राइमेज़ पहले आता है।
- यह सोचना कि अग्रगामी और पश्चगामी रज्जुक अलग-अलग एंज़ाइम बनाते हैं — गलत। एक ही डीएनए पॉलीमरेज़ दोनों बनाता है, अंतर केवल दिशा और प्राइमर की संख्या में है।
- यह सोचना कि ओकाज़ाकी खंड केवल जीवाणु में बनते हैं — गलत। यूकैरियोट और प्रोकैरियोट दोनों में पश्चगामी रज्जुक ओकाज़ाकी खंडों में बनता है, केवल औसत लंबाई अलग होती है।
- यह कहना कि मेसेल्सन-स्टाल की पहली पीढ़ी में हल्का बैंड दिखता है — गलत। पहली पीढ़ी में सारा डीएनए हाइब्रिड होता है; हल्का बैंड दूसरी पीढ़ी से शुरू होता है।
- A-T और G-C के हाइड्रोजन बंध की संख्या भूल जाना। याद रखें, G-C में तीन बंध होते हैं, A-T में दो — इसीलिए GC-प्रधान डीएनए अधिक ऊष्मा-स्थिर होता है।
परीक्षा कॉर्नर: NCERT कक्षा 12
NCERT कक्षा 12 जीव विज्ञान के "वंशागति के आणविक आधार" (Molecular Basis of Inheritance) अध्याय में डीएनए प्रतिकृति विस्तार से पढ़ाई जाती है, और CBSE बोर्ड के साथ-साथ NEET व JEE जैसी प्रवेश परीक्षाओं में भी यह लगातार पूछा जाने वाला विषय है। बहुविकल्पीय प्रश्नों में एंज़ाइम-कार्य मिलान, चारगैफ के नियम पर आधारित गणना, मेसेल्सन-स्टाल के परिणाम और ओकाज़ाकी खंड की परिभाषा सबसे अधिक आती है।
एक नमूना दीर्घ-उत्तरीय प्रश्न
परिस्थिति: एक डीएनए रज्जुक का भाग ATGCGTACGCAT (5′→3′) है। मेसेल्सन और स्टाल ने E. coli में भारी-से-हल्के नाइट्रोजन का प्रयोग किया, जिसमें दूसरी पीढ़ी में समान तीव्रता के दो बैंड मिले।
- क. प्रतिकृति फोर्क की परिभाषा दें।
- ख. ऊपर दिए रज्जुक का पूरक रज्जुक लिखें और उसमें कुल हाइड्रोजन बंध की गणना करें।
- ग. दूसरी पीढ़ी में समान तीव्रता के दो बैंड मिलने का कारण स्पष्ट करें।
- घ. विश्लेषण करें कि यह परिणाम अर्धसंरक्षी सिद्धांत का समर्थन और संरक्षी सिद्धांत का खंडन कैसे करता है।
बहुविकल्पीय प्रश्नों के लिए त्वरित तथ्य
ये याद रहें तो कुछ अंक लगभग तय हो जाते हैं।
- द्विकुंडली संरचना के प्रस्तावक: वाटसन और क्रिक (1953)
- अर्धसंरक्षी प्रतिकृतियन सिद्ध किया: मेसेल्सन और स्टाल (1958), E. coli में
- ओकाज़ाकी खंड की खोज: रेइजी और सुनेको ओकाज़ाकी (1968)
- डीएनए खोलता है: हेलिकेज़; जोड़ लगाता है: लाइगेज़
- A-T बंध: 2; G-C बंध: 3
- नया रज्जुक सदैव बढ़ता है: 5′→3′ दिशा में
- PCR के आविष्कारक: केरी मुलिस (1983)
रिवीज़न: अंतिम समय का सारांश
परीक्षा से पहली रात यह कुछ पंक्तियाँ पढ़ लें।
- परिभाषा: एक डीएनए से दो समान प्रतियाँ बनना, हर एक में एक पुराना और एक नया रज्जुक (अर्धसंरक्षी)।
- चारगैफ का नियम: %A = %T, %G = %C। A-T में 2, G-C में 3 हाइड्रोजन बंध।
- मेसेल्सन-स्टाल (1958): ¹⁵N/¹⁴N से साबित हुआ प्रतिकृतियन अर्धसंरक्षी है; पीढ़ी 1 पूरी तरह हाइब्रिड, हर पीढ़ी में हाइब्रिड अंश आधा होता जाता है।
- एंज़ाइम क्रम: हेलिकेज़ खोलता है → SSB थामे रखता है → प्राइमेज़ प्राइमर लगाता है → पॉलीमरेज़ 5′→3′ बढ़ाता है → लाइगेज़ जोड़ लगाता है।
- अग्रगामी रज्जुक: निरंतर, एक प्राइमर। पश्चगामी रज्जुक: ओकाज़ाकी खंडों में, कई प्राइमर।
- प्रूफरीडिंग पॉलीमरेज़ की अपनी क्षमता है; मिसमैच रिपेयर बाकी पकड़ लेता है, अंतिम गलती दर एक अरब में एक से भी कम हो जाती है।
- वास्तविक उपयोग: PCR, डीएनए फिंगरप्रिंटिंग, फोरेंसिक पहचान, संपूर्ण जीनोम अनुक्रमण।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
डीएनए प्रतिकृति क्या है?
डीएनए प्रतिकृति वह प्रक्रिया है जिसमें एक डीएनए अणु अपनी दो समान प्रतियाँ बनाता है, और हर नई प्रति में एक मूल रज्जुक और एक नया बना रज्जुक होता है।
डीएनए प्रतिकृति को अर्धसंरक्षी क्यों कहा जाता है?
क्योंकि हर नए बने द्विरज्जुकी डीएनए अणु में मूल अणु का एक रज्जुक बचा (संरक्षित) रहता है और एक पूरी तरह नया रज्जुक जुड़ता है। मेसेल्सन-स्टाल प्रयोग (1958) ने इसे सीधे प्रमाणित किया।
मेसेल्सन-स्टाल प्रयोग ने क्या साबित किया?
भारी (¹⁵N) और हल्के (¹⁴N) नाइट्रोजन से चिह्नित डीएनए का प्रयोग करके उन्होंने दिखाया कि एक पीढ़ी बाद सारा डीएनए हाइब्रिड था और दूसरी पीढ़ी बाद आधा हाइब्रिड और आधा पूरी तरह हल्का था — ठीक वही पैटर्न जो अर्धसंरक्षी प्रतिकृतियन से अपेक्षित है।
हेलिकेज़ का कार्य क्या है?
हेलिकेज़ दो मूल डीएनए रज्जुकों के बीच के हाइड्रोजन बंध तोड़कर उन्हें अलग करता है, जिससे प्रतिकृति फोर्क बनता है।
अग्रगामी और पश्चगामी रज्जुक में क्या अंतर है?
अग्रगामी रज्जुक फोर्क की गति की दिशा में निरंतर बनता है, केवल एक प्राइमर से। पश्चगामी रज्जुक विपरीत दिशा में छोटे-छोटे अलग ओकाज़ाकी खंडों में बनता है, हर खंड को अपना प्राइमर चाहिए, बाद में लाइगेज़ उन्हें जोड़ता है।
ओकाज़ाकी खंड क्या है?
प्रतिकृतियन के दौरान पश्चगामी रज्जुक पर बनने वाला हर छोटा डीएनए खंड ओकाज़ाकी खंड कहलाता है, जिसे रेइजी और सुनेको ओकाज़ाकी ने 1968 में पहली बार पहचाना। लाइगेज़ लगातार खंडों को जोड़कर एक निरंतर रज्जुक बनाता है।
चारगैफ का नियम क्या कहता है?
किसी भी डीएनए अणु में एडेनिन की मात्रा थाइमिन के बराबर (%A = %T) और ग्वानिन की मात्रा साइटोसिन के बराबर (%G = %C) होती है, भले ही A+T और G+C का समग्र अनुपात प्रजातियों में अलग-अलग हो।
A-T और G-C युग्म में कितने हाइड्रोजन बंध होते हैं?
एडेनिन-थाइमिन युग्म दो हाइड्रोजन बंधों से जुड़ा होता है; ग्वानिन-साइटोसिन युग्म तीन से — इसीलिए GC-प्रधान डीएनए AT-प्रधान डीएनए से अधिक ऊष्मा-स्थिर होता है।
क्या डीएनए पॉलीमरेज़ गलती करता है?
कुछ गलतियाँ होती हैं, पर इसकी अपनी 3′→5′ प्रूफरीडिंग क्रिया लगभग सभी पकड़ लेती है; जो बच जाती हैं उनमें से अधिकांश को बाद में मिसमैच रिपेयर तंत्र सुधार देता है, जिससे अंतिम गलती दर बहुत कम रह जाती है।
डीएनए प्रतिकृति का सिद्धांत वास्तविक जीवन में कहाँ उपयोग होता है?
यही सिद्धांत PCR (बहुत कम डीएनए से अरबों प्रतियाँ बनाने) में, डीएनए फिंगरप्रिंटिंग और फोरेंसिक पहचान में, संपूर्ण जीनोम अनुक्रमण में, और कोविड-19 जैसी बीमारियों की RT-PCR जाँच में काम करता है।
इस विषय पर और पढ़ाई
एनिमेशन से अवधारणा साफ़ हुई, अब परीक्षा की तैयारी: सिलेबस, सुझाव, किताबें और प्रवेश परीक्षा गाइड नीचे हैं (अंग्रेज़ी में)।
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