गोलक को खींचकर छोड़ें — जहाँ छोड़ेंगे वही आयाम है
नियंत्रण
गुरुत्वीय त्वरण, g (m/s²)
मापन
- कोणीय विस्थापन, θ
- 10.0°
- गोलक की चाल, v
- 0.00m/s
- सूत्र से आवर्तकाल, T = 2π√(L/g)
- 2.007s
- मापा गया आवर्तकाल
- माप रहे हैं…
- आवृत्ति, f
- 0.498Hz
- गतिज ऊर्जा, Eₖ
- 0.000J
- स्थितिज ऊर्जा, Eₚ
- 0.074J
सिमुलेशन का उपयोग कैसे करें
- लंबाई का स्लाइडर खिसकाएँ: लंबाई चार गुना करने पर "मापा गया आवर्तकाल" दोगुना हो जाता है।
- गोलक का द्रव्यमान बदलें — गोलक बड़ा-छोटा होगा, पर आवर्तकाल बिल्कुल नहीं बदलेगा।
- आयाम 5° से 70° तक बढ़ाएँ: बड़े आयाम पर मापा गया आवर्तकाल सूत्र के मान से अधिक हो जाता है।
- अवमंदन शून्य रखने पर दाईं ओर का "कुल ऊर्जा" बार स्थिर रहता है; अवमंदन बढ़ाने पर धीरे-धीरे घटता है।
झूले से लोलक तक: कहानी की शुरुआत
मेले या पार्क में झूला तो आपने ज़रूर झूला होगा। कोई एक बार धक्का दे, तो झूला आगे जाता है, पल भर रुकता है और उसी रास्ते पीछे लौट आता है — बार-बार। दिलचस्प बात यह है कि धक्का हल्का हो या तेज़, एक बार आगे-पीछे जाने में लगभग उतना ही समय लगता है।
अब दादाजी के कमरे की पुरानी पेंडुलम घड़ी को याद कीजिए। शीशे के पीछे पीतल की एक चकती टिक-टिक करती झूलती रहती है। वही लोलक है, और घड़ी सही समय इसलिए बताती है क्योंकि हर झूल में लोलक बराबर समय लेता है। सैकड़ों साल तक दुनिया इसी एक नियम पर भरोसा करके समय नापती रही।
भौतिकी में झूले या घड़ी के लोलक के इस सबसे सरल, आदर्श रूप को सरल लोलक कहते हैं — एक धागा और उसके सिरे पर एक छोटा भारी गोलक, बस। इतनी साधारण चीज़ से हम पृथ्वी का गुरुत्वीय त्वरण नाप सकते हैं, और यह भी पहले से बता सकते हैं कि चंद्रमा पर वही लोलक कैसे झूलेगा।
बिल्कुल शुरुआत से: लोलक वापस क्यों आता है?
जब लोलक सीधा नीचे लटककर स्थिर होता है, तब धागे का तनाव और गोलक का भार एक ही ऊर्ध्वाधर रेखा में होते हैं — कोई भी गोलक को बगल में नहीं खींचता। इसे साम्यावस्था कहते हैं।
अब गोलक को एक तरफ़ खिसकाइए। भार mg अब भी सीधा नीचे है, पर धागा तिरछा खींच रहा है। भार का एक भाग, mg·sinθ, गोलक को फिर से बीच की ओर धकेलता है। जो बल वस्तु को हमेशा साम्यावस्था की ओर लौटाना चाहता है, उसे प्रत्यानयन बल कहते हैं।
छोड़ने पर गोलक बीच की ओर दौड़ता है और जितना नीचे आता है उतना तेज़ होता है। बीच में वह रुक नहीं पाता, क्योंकि वहीं उसकी चाल सबसे अधिक होती है; जड़त्व उसे दूसरी ओर ले जाता है। वहाँ प्रत्यानयन बल उलटी दिशा में खींचता है, गोलक रुकता है और लौटता है। यही दोलन है।
एक आसान तुलना: किसी कटोरे में कंचा रखिए। उसे किनारे की ओर धकेलकर छोड़ें तो वह तली तक लुढ़कता है, दूसरी तरफ़ चढ़ता है और फिर लौटता है। लोलक का गोलक असल में एक अदृश्य कटोरे में लुढ़क रहा है — धागा ही उस कटोरे का आकार तय करता है।
ये शब्द ज़रूर जानिए
किताब और परीक्षा में ये शब्द बार-बार आते हैं। नीचे हर शब्द का आसान अर्थ और एक जाना-पहचाना उदाहरण दिया गया है।
| राशि | आसान अर्थ | जाना-पहचाना उदाहरण |
|---|---|---|
| एक पूर्ण दोलन | गोलक का एक सिरे से दूसरे सिरे तक जाकर वापस पहले सिरे पर आना | झूले का एक बार आगे जाकर लौट आना |
| आवर्तकाल (T) | एक पूर्ण दोलन में लगा समय, मात्रक सेकंड (s) | पेंडुलम घड़ी की एक टिक-टिक |
| आवृत्ति (f) | एक सेकंड में होने वाले पूर्ण दोलन; f = 1/T, मात्रक हर्ट्ज़ (Hz) | झूला हर सेकंड कितनी बार लौटता है |
| आयाम | साम्यावस्था से अधिकतम विस्थापन (कोण या दूरी) | झूला कितना ऊँचा जाता है |
| प्रभावी लंबाई (L) | निलंबन बिंदु से गोलक के गुरुत्व केंद्र तक की दूरी | धागे की लंबाई + गोलक की त्रिज्या |
| गोलक | धागे के सिरे पर लटकी छोटी भारी वस्तु | घड़ी के लोलक की पीतल की चकती |
| सरल आवर्त गति | वह गति जिसमें त्वरण विस्थापन के समानुपाती और साम्यावस्था की ओर हो | छोटे आयाम पर लोलक, स्प्रिंग से लटका द्रव्यमान |
सरल लोलक के आवर्तकाल का सूत्र
अब मुख्य बात। छोटे आयाम के लिए आवर्तकाल केवल दो चीज़ों पर निर्भर करता है: प्रभावी लंबाई L और गुरुत्वीय त्वरण g। द्रव्यमान और आयाम दोनों ग़ायब हो जाते हैं — यही इस सूत्र की सबसे मज़ेदार बात है।
T = 2π√(L/g)आवर्तकाल
f = 1/T = (1/2π)√(g/L)आवृत्ति
g = 4π²L / T²g ज्ञात करना
सूत्र कहाँ से आया (आसान तर्क)
गोलक को θ कोण पर विस्थापित करने पर प्रत्यानयन बल F = −mg·sinθ होता है। छोटे कोण (रेडियन में) के लिए sinθ लगभग θ के बराबर है, और चाप के अनुदिश विस्थापन x = Lθ। इसलिए F ≈ −mg·(x/L)।
न्यूटन के दूसरे नियम F = ma में रखने पर a = −(g/L)·x, यानी त्वरण विस्थापन के समानुपाती और उसकी विपरीत दिशा में है। यही सरल आवर्त गति की परिभाषा a = −ω²x है, इसलिए ω² = g/L।
चूँकि T = 2π/ω, इसलिए T = 2π√(L/g)। ध्यान दीजिए, द्रव्यमान m दोनों तरफ़ से कट गया — इसी वजह से आवर्तकाल द्रव्यमान पर निर्भर नहीं करता।
a = −(g/L)·x ⇒ ω = √(g/L) ⇒ T = 2π√(L/g)
पहला नियम: समकालिकता का नियम
आयाम छोटा हो (लगभग 10° तक) तो हर दोलन में बराबर समय लगता है। छोटा झूल छोटा रास्ता तय करता है पर धीमा भी होता है, इसलिए समय वही रहता है। घड़ी का लोलक धीरे-धीरे कम झूलने लगे, तब भी घड़ी सही समय देती है।
दूसरा नियम: लंबाई का नियम
g नियत हो तो T ∝ √L। लंबाई चार गुना करने पर आवर्तकाल दोगुना: 1 m लोलक का T = 2.01 s, और 4 m लोलक का T = 4.01 s। लंबी रस्सी वाला झूला आराम से झूलता है, छोटी रस्सी वाला जल्दी-जल्दी।
तीसरा नियम: त्वरण का नियम
लंबाई नियत हो तो T ∝ 1/√g। जहाँ गुरुत्व कमज़ोर है वहाँ लोलक धीरे झूलता है। चंद्रमा पर g = 1.62 m/s², इसलिए 1 m लोलक का आवर्तकाल 4.94 s होगा — पृथ्वी के लगभग 2.46 गुना।
चौथा नियम: द्रव्यमान का नियम
लंबाई और g समान हों तो गोलक का द्रव्यमान, आकार या पदार्थ बदलने से आवर्तकाल नहीं बदलता। झूले पर आपका छोटा भाई बैठे या आप — रस्सी एक हो तो दोनों एक ही लय में झूलेंगे।
ऊर्जा का खेल: गतिज और स्थितिज ऊर्जा की अदला-बदली
झूले के सबसे ऊँचे बिंदु पर आप एक पल के लिए ठहर जाते हैं और पेट में गुदगुदी होती है — उस पल आपकी सारी ऊर्जा स्थितिज ऊर्जा है। नीचे आते समय ऊँचाई घटती है, चाल बढ़ती है; सबसे नीचे चाल अधिकतम — तब सारी ऊर्जा गतिज ऊर्जा है।
वायु प्रतिरोध और घर्षण न हों तो इस अदला-बदली में कोई ऊर्जा नष्ट नहीं होती, कुल यांत्रिक ऊर्जा हमेशा बराबर रहती है। सिमुलेशन में दाईं ओर के बार देखिए: Eₖ और Eₚ ऊपर-नीचे होते हैं, पर कुल E का बार ज़रा भी नहीं हिलता।
एक हिसाब करें: 0.5 kg का गोलक 1 m धागे पर 10° तक खींचा गया। तब वह सबसे निचले बिंदु से h = L(1 − cosθ) = 1.52 cm ऊपर है, इसलिए स्थितिज ऊर्जा mgh = 0.074 J। नीचे पहुँचकर यह पूरी गतिज ऊर्जा बन जाती है, अतः अधिकतम चाल v = √(2gh) = 0.55 m/s।
असल में वायु प्रतिरोध और निलंबन बिंदु का घर्षण हर झूल में थोड़ी ऊर्जा ले लेते हैं, इसलिए बिना धक्के के झूला धीरे-धीरे रुक जाता है। इसे अवमंदित दोलन कहते हैं। पेंडुलम घड़ी में एक स्प्रिंग या लटका भार हर बार हल्का धक्का देकर खोई ऊर्जा लौटाता है।
Eₚ = mgL(1 − cosθ)स्थितिज ऊर्जा
Eₖ = ½mv²गतिज ऊर्जा
Eₖ + Eₚ = नियतांकअवमंदन न हो तो
सिमुलेशन में खुद प्रयोग करें
रटने से कहीं ज़्यादा याद वह रहता है जो आँखों से देखा हो। ऊपर के सिमुलेशन में ये छोटे प्रयोग कीजिए, और हर बार पहले अनुमान लगाइए कि क्या होगा।
- लंबाई 1 m से 2.5 m करें: क्या झूल धीमा हुआ? मापा गया आवर्तकाल लगभग कितने गुना बढ़ा?
- द्रव्यमान 0.1 kg से 2 kg करें: गोलक बड़ा होगा, पर मापे गए आवर्तकाल पर ध्यान दें।
- आयाम 10° से 70° करें: क्या मापा गया और सूत्र वाला आवर्तकाल अब भी मिलते हैं?
- ग्रह बदलकर चंद्रमा, मंगल, बृहस्पति पर जाएँ: लोलक सबसे तेज़ कहाँ झूलता है?
- अवमंदन बढ़ाएँ: कुल ऊर्जा का बार और θ का ग्राफ़ कैसे सिकुड़ते हैं?
- गोलक को माउस या उँगली से खींचकर किसी भी कोण पर ले जाकर छोड़ें।
हल सहित आंकिक प्रश्न
अब कुछ प्रश्न हल करते हैं। शुरू करने से पहले दिया हुआ और पूछा हुआ लिख लें तो गलती आधी रह जाती है। जब तक अलग न कहा जाए, g = 9.8 m/s² लें।
प्रश्न 1: 1 मीटर लोलक का आवर्तकाल
दिया है L = 1 m, g = 9.8 m/s²। T = 2π√(L/g) = 2 × 3.1416 × √(1/9.8) = 2.01 s। आवृत्ति f = 1/T = 0.50 Hz, यानी हर सेकंड आधे से थोड़ा कम दोलन।
प्रश्न 2: प्रयोगशाला में g ज्ञात करना
एक 1 m लोलक 20 पूर्ण दोलन 40.1 s में करता है। तो एक दोलन का समय T = 40.1/20 = 2.005 s।
अब g = 4π²L/T² = 4 × (3.1416)² × 1 / (2.005)² = 9.82 m/s²। एक की जगह कई दोलनों का समय नापने से स्टॉपवॉच दबाने की गलती बँटकर छोटी हो जाती है।
प्रश्न 3: सेकंड लोलक की लंबाई
जिस लोलक का आवर्तकाल 2 s हो (यानी एक सिरे से दूसरे सिरे तक 1 s), उसे सेकंड लोलक कहते हैं। T = 2 रखने पर L = gT²/4π² = g/π² = 0.993 m — लगभग एक मीटर।
प्रश्न 4: वही लोलक चंद्रमा पर
पृथ्वी पर 1 m लोलक का T = 2.01 s। चंद्रमा पर g = 1.62 m/s², इसलिए T = 2π√(1/1.62) = 4.94 s। मंगल पर (g = 3.71 m/s²) उसी लोलक का T = 3.26 s।
प्रश्न 5: आवर्तकाल दोगुना करने के लिए लंबाई
T ∝ √L, इसलिए T दोगुना करने के लिए √L दोगुना, यानी L चार गुना करनी होगी। 1 m से 4 m करने पर T = 2.01 s से 4.01 s हो जाता है। लंबाई एक-चौथाई (0.25 m) करने पर T आधा होकर 1.00 s।
लंबाई बनाम आवर्तकाल: एक नज़र में
इस तालिका की हर संख्या T = 2π√(L/g) से निकाली गई है। ध्यान दें, लंबाई चार गुना होने पर (0.25 → 1 m) आवर्तकाल ठीक दोगुना होता है।
| लंबाई L (m) | आवर्तकाल T (s), पृथ्वी | आवृत्ति f (Hz) | आवर्तकाल T (s), चंद्रमा |
|---|---|---|---|
| 0.25 | 1.00 | 1.00 | 2.47 |
| 0.50 | 1.42 | 0.70 | 3.49 |
| 1.00 | 2.01 | 0.50 | 4.94 |
| 1.50 | 2.46 | 0.41 | 6.05 |
| 2.00 | 2.84 | 0.35 | 6.98 |
| 2.50 | 3.17 | 0.32 | 7.81 |
बड़े आयाम पर सूत्र कितना गलत होता है
T = 2π√(L/g) एक सन्निकट मान है, क्योंकि हमने sinθ ≈ θ माना था। कोण बढ़ने पर sinθ, θ से छोटा हो जाता है, प्रत्यानयन बल थोड़ा कमज़ोर पड़ता है और लोलक थोड़ा अधिक समय लेता है। 1 m लोलक के लिए सटीक गणना से तुलना:
| आयाम | सूत्र से T (s) | सटीक T (s) | अंतर |
|---|---|---|---|
| 5° | 2.007 | 2.008 | 0.05% |
| 10° | 2.007 | 2.011 | 0.19% |
| 20° | 2.007 | 2.022 | 0.77% |
| 30° | 2.007 | 2.042 | 1.74% |
| 45° | 2.007 | 2.087 | 4.00% |
| 60° | 2.007 | 2.154 | 7.32% |
| 70° | 2.007 | 2.212 | 10.21% |
वे गलतियाँ जो लगभग सभी करते हैं
परीक्षा की कॉपियों और प्रैक्टिकल वाइवा में ये गलतियाँ बार-बार दिखती हैं। पहले से पता हो तो आप इनसे बच सकते हैं।
- "भारी गोलक तेज़ झूलता है" — नहीं! छोटे आयाम पर आवर्तकाल द्रव्यमान पर निर्भर नहीं करता।
- केवल धागे की लंबाई नापना — प्रभावी लंबाई = धागे की लंबाई + गोलक की त्रिज्या।
- आधे दोलन (एक सिरे से दूसरे सिरे तक) को पूर्ण दोलन गिनना — पूर्ण दोलन में वापस उसी जगह आना होता है।
- "लंबाई दोगुनी तो आवर्तकाल दोगुना" — नहीं, आवर्तकाल √2 गुना होता है; दोगुना करने के लिए लंबाई चार गुना चाहिए।
- बहुत बड़े आयाम (30°–40°) पर g नापना — तब सूत्र सटीक नहीं रहता।
असल ज़िंदगी में लोलक
घड़ियाँ: सदियों तक पेंडुलम घड़ी सबसे सटीक घड़ी रही। गर्मी में धातु की छड़ थोड़ी फैल जाती है, आवर्तकाल बढ़ता है और घड़ी सुस्त चलती है — इसलिए अच्छी घड़ियों में ऐसी छड़ें लगती थीं जिनकी लंबाई तापमान से लगभग नहीं बदलती। गोलक के नीचे का नट घुमाकर उसे ऊपर-नीचे करके समय ठीक किया जाता है।
झूला: झूले को सही लय में धक्का दें तो वह हर बार पहले से ऊँचा जाता है। जब धक्के की लय झूले की अपनी प्राकृतिक आवृत्ति से मिलती है, तो उसे अनुनाद कहते हैं। गलत समय पर धक्का दें तो झूला उलटे धीमा हो जाता है।
फूको लोलक: बहुत लंबा, भारी लोलक घंटों झुलाया जाए तो उसके झूलने का तल धीरे-धीरे घूमता दिखता है। असल में तल वहीं रहता है, नीचे पृथ्वी घूम रही होती है — पृथ्वी के घूर्णन का यह पहला सीधा प्रमाण था।
ऊँची इमारतें: कुछ गगनचुंबी इमारतों के ऊपरी हिस्से में सैकड़ों टन का विशाल भार लटका होता है, जिसे ट्यून्ड मास डैम्पर कहते हैं। आँधी या भूकंप में इमारत हिले तो यह उलटी लय में झूलकर इमारत का हिलना कम कर देता है।
g नापना: भूवैज्ञानिक कभी सटीक लोलक लेकर अलग-अलग जगहों पर g का सूक्ष्म अंतर नापते थे, जिससे ज़मीन के नीचे घने खनिजों का सुराग मिलता था।
परीक्षा कोना: CBSE कक्षा 11 और प्रैक्टिकल वाइवा
कक्षा 11 के दोलन अध्याय और भौतिकी प्रैक्टिकल में सरल लोलक से कुछ जाने-पहचाने ढंग के प्रश्न आते हैं। नीचे आम प्रश्न और उनके छोटे उत्तर हैं।
लघु उत्तरीय प्रश्न
प्रश्न: सेकंड लोलक किसे कहते हैं? उत्तर: जिस लोलक का आवर्तकाल ठीक 2 सेकंड हो।
प्रश्न: पहाड़ की चोटी पर पेंडुलम घड़ी सुस्त क्यों चलती है? उत्तर: ऊँचाई पर g घटता है और T ∝ 1/√g, इसलिए हर झूल में अधिक समय लगता है और घड़ी पीछे रह जाती है।
प्रैक्टिकल वाइवा प्रश्न
प्रश्न: एक दोलन की जगह 20 दोलनों का समय क्यों नापते हैं? उत्तर: स्टॉपवॉच शुरू-बंद करने की मानवीय त्रुटि 20 दोलनों में बँट जाती है, इसलिए T अधिक सटीक मिलता है।
प्रश्न: L–T² ग्राफ़ कैसा होता है? उत्तर: मूल बिंदु से गुज़रती सरल रेखा, जिसका ढाल 4π²/g है (L को x-अक्ष पर और T² को y-अक्ष पर लेने पर)।
प्रश्न: आयाम छोटा क्यों रखते हैं? उत्तर: ताकि sinθ ≈ θ रहे और गति सरल आवर्त बनी रहे; बड़े आयाम पर T सूत्र से अधिक आता है।
आंकिक प्रश्न का ढंग
"L = 1 m, 20 दोलन 40.1 s में — g ज्ञात कीजिए" जैसा प्रश्न: पहले भाग देकर T, फिर g = 4π²L/T², जैसा प्रश्न 2 में 9.82 m/s² मिला।
एक नज़र में दोहराव
परीक्षा से पहले की रात सिर्फ़ इतना पढ़ लें, मुख्य बातें याद आ जाएँगी।
- सरल लोलक = भारहीन अवितान्य धागा + बिंदुवत भारी गोलक + घर्षणरहित निलंबन।
- प्रत्यानयन बल F = −mg·sinθ; छोटे θ पर गति सरल आवर्त।
- T = 2π√(L/g), f = 1/T, g = 4π²L/T²।
- चार नियम: समकालिकता, लंबाई (T ∝ √L), त्वरण (T ∝ 1/√g), द्रव्यमान (कोई प्रभाव नहीं)।
- सेकंड लोलक: T = 2 s, L ≈ 0.993 m।
- सिरों पर सारी ऊर्जा स्थितिज, बीच में सारी गतिज; कुल ऊर्जा नियत।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
सरल लोलक किसे कहते हैं?
किसी भारी बिंदुवत गोलक को भारहीन, अवितान्य धागे से दृढ़ आधार से लटकाने पर, यदि वह बिना घर्षण के स्वतंत्र रूप से दोलन कर सके, तो उसे सरल लोलक कहते हैं। यह एक आदर्श धारणा है; असली लोलक इसके निकट होते हैं।
सरल लोलक का आवर्तकाल किस पर निर्भर करता है?
केवल प्रभावी लंबाई L और गुरुत्वीय त्वरण g पर: T = 2π√(L/g)। छोटे आयाम पर यह गोलक के द्रव्यमान और आयाम पर निर्भर नहीं करता।
क्या द्रव्यमान से आवर्तकाल बदलता है?
नहीं। भारी गोलक पर गुरुत्व बल अधिक है, पर उसे त्वरित करने के लिए भी अधिक बल चाहिए। दोनों प्रभाव बराबर कट जाते हैं, इसलिए सूत्र में m नहीं है।
सेकंड लोलक की लंबाई कितनी होती है?
जिस लोलक का आवर्तकाल 2 s हो वह सेकंड लोलक है। L = g/π² से, g = 9.8 m/s² पर इसकी लंबाई लगभग 0.993 m है।
सरल लोलक की गति सरल आवर्त क्यों है?
छोटे आयाम पर प्रत्यानयन बल F = −mg·sinθ ≈ −mgθ, यानी बल विस्थापन के समानुपाती और साम्यावस्था की ओर है। यही सरल आवर्त गति की शर्त है।
सरल लोलक से g कैसे ज्ञात करते हैं?
कई दोलनों का समय नापकर T निकालें और g = 4π²L/T² में रखें। अधिक सटीकता के लिए अलग-अलग लंबाइयों पर नापकर L–T² ग्राफ़ के ढाल से g निकालें।
गर्मी में पेंडुलम घड़ी सुस्त क्यों चलती है?
गर्मी से धातु की छड़ फैलती है और प्रभावी लंबाई बढ़ जाती है। T ∝ √L होने से आवर्तकाल बढ़ता है, इसलिए हर टिक में अधिक समय लगता है और घड़ी पीछे रह जाती है।
इस विषय पर और पढ़ाई
एनिमेशन से अवधारणा साफ़ हुई, अब परीक्षा की तैयारी: सिलेबस, सुझाव, किताबें और प्रवेश परीक्षा गाइड नीचे हैं (अंग्रेज़ी में)।
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SSC Physics: syllabus and preparation
HSC
HSC Physics: syllabus and preparation
Textbook
Class 9-10 Physics textbook
Admission
Engineering admission test preparation
Admission
Dhaka University science unit admission 2026-27
English
Composition: The Uses of Electricity
Bangla
প্রতিবেদন: বিজ্ঞান মেলা (बांग्ला में)
English
Paragraph: Science in Everyday Life
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